KORBA तिलकेजा में परंपरागत श्रद्धा के साथ मनाया गया गौरा–गौरी पर्व

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तिलकेजा में परंपरागत श्रद्धा के साथ मनाया गया गौरा–गौरी पर्व

 

 

 

 

 

 

 

कोरबा जिले के ग्राम पंचायत तिलकेजा अंतर्गत जाला मोहल्ले में प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकसंस्कृति और परंपरा का प्रतीक गौरा–गौरी पर्व श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर भगवान शिव (गौरा) एवं माता पार्वती (गौरी) की विधिवत पूजा-अर्चना कर ग्राम एवं समाज की सुख-समृद्धि, शांति और मंगल की कामना की गई।

गौरा–गौरी पर्व भारतीय सनातन परंपरा में शिव–पार्वती के पावन दांपत्य, शक्ति और सृजन का प्रतीक माना जाता है। शास्त्रों में कहा गया है—

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।”

(जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवताओं का वास होता है।)

इस पर्व के माध्यम से नारी शक्ति, परिवारिक एकता और सामाजिक समरसता का संदेश दिया जाता है। मान्यता है कि माता पार्वती की तपस्या से भगवान शिव का गृहस्थ जीवन प्रारंभ हुआ, जिससे सृष्टि का संतुलन बना। इसी भाव को लोक परंपरा में गौरा–गौरी के रूप में पूजा जाता है।

आयोजन के दौरान छत्तीसगढ़ की पारंपरिक कर्मा बाजा, ढोल-मांदर की मधुर थाप पर ग्रामीणों द्वारा लोकनृत्य की सुंदर प्रस्तुति दी गई। पारंपरिक वेशभूषा में सजे ग्रामीणों, महिलाओं और युवाओं की सहभागिता से पूरा जाला मोहल्ला भक्ति और उल्लास के रंग में रंगा नजर आया।

कार्यक्रम में जनपद सदस्य किशन कोसले विशेष रूप से उपस्थित रहे। उन्होंने गौरा–गौरी पर्व को छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति की आत्मा बताते हुए कहा कि—

“धर्मेणैव समाजस्य धारणं भवति।”

(धर्म से ही समाज की रक्षा और उन्नति होती है।)

उन्होंने ग्रामीणों से ऐसी परंपराओं को आने वाली पीढ़ियों तक संरक्षित और जीवंत बनाए रखने का आह्वान किया।

कार्यक्रम के समापन पर विधि-विधान एवं मंत्रोच्चार के साथ गौरा–गौरी का विसर्जन किया गया। बड़ी संख्या में ग्रामीणों की उपस्थिति ने सामाजिक एकता, आपसी भाईचारे और लोकसंस्कृति की सशक्त झलक प्रस्तुत की।

गौरा–गौरी पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह पर्व छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत, नारी सम्मान और सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करने वाला महत्वपूर्ण लोक उत्सव भी है।

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