जांजगीर-चांपा में दिव्यांगों की अनदेखी!
शिविर बिना सूचना स्थगित, 90% दिव्यांग राजेश कश्यप वर्षों से इलेक्ट्रॉनिक ट्राइसाइकिल के लिए भटकने को मजबूर
जांजगीर-चांपा। जिले में दिव्यांगजनों के लिए संचालित योजनाओं और संवेदनशीलता के दावों के बीच प्रशासनिक लापरवाही का गंभीर मामला सामने आया है। विकासखंड बम्हनीडीह में 30 अप्रैल को आयोजित होने वाला निःशुल्क सहायक उपकरण मूल्यांकन शिविर बिना किसी पूर्व सूचना के स्थगित कर दिया गया। इसके चलते दूर-दराज गांवों से पहुंचे 10 से 12 दिव्यांगजन घंटों तक शिविर स्थल पर भटकते रहे।
दिव्यांगजनों और उनके परिजनों का आरोप है कि समाज कल्याण विभाग द्वारा न तो शिविर स्थगित होने की कोई सूचना दी गई और न ही वैकल्पिक व्यवस्था की गई। भीषण गर्मी और शारीरिक परेशानी के बावजूद दिव्यांगजन निराश होकर वापस लौटने को मजबूर हुए। इस घटना ने विभागीय कार्यप्रणाली और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इसी बीच ग्राम पोडीकला (दारंग) निवासी 90 प्रतिशत दिव्यांग राजेश कुमार कश्यप का मामला भी सुर्खियों में है। राजेश पिछले लंबे समय से इलेक्ट्रॉनिक ट्राइसाइकिल की मांग को लेकर लगातार अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं। जानकारी के अनुसार उन्होंने 28 नवंबर 2024 को जनसमस्या निवारण शिविर सरहर में आवेदन दिया था। इसके बाद 2 फरवरी 2026 को कलेक्टर जनदर्शन, जांजगीर-चांपा में भी आवेदन प्रस्तुत किया, लेकिन आज तक उन्हें नई इलेक्ट्रॉनिक ट्राइसाइकिल उपलब्ध नहीं कराई गई।
राजेश कुमार की पुरानी ट्राइसाइकिल पूरी तरह जर्जर और अनुपयोगी हो चुकी है, जिसके कारण उन्हें रोजमर्रा के कार्यों में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। विकलांगता के कारण वे कई बार कलेक्टर कार्यालय और विभिन्न शिविरों में गुहार लगा चुके हैं, लेकिन अब तक उनकी समस्या का समाधान नहीं हो सका।
मामले की गंभीरता को देखते हुए छत्तीसगढ़ विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने भी 10 मार्च 2026 को कलेक्टर को पत्र लिखकर राजेश कुमार को शीघ्र इलेक्ट्रॉनिक ट्राइसाइकिल उपलब्ध कराने का आग्रह किया था। पत्र में स्पष्ट उल्लेख किया गया था कि प्रार्थी 90 प्रतिशत दिव्यांग है और उसकी पुरानी ट्राइसाइकिल पूरी तरह खराब हो चुकी है। इसके बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होना प्रशासनिक उदासीनता को उजागर करता है।
स्थानीय लोगों और परिजनों का कहना है कि सरकार दिव्यांगजनों के लिए योजनाएं और शिविर चलाने के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर जरूरतमंद हितग्राही बुनियादी सुविधाओं के लिए वर्षों तक भटकने को मजबूर हैं। लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्काल इलेक्ट्रॉनिक ट्राइसाइकिल उपलब्ध कराई जाए और लापरवाही बरतने वाले जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए।
अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर कितने आवेदन, कितनी गुहार और कितनी सिफारिशों के बाद प्रशासन जागेगा? क्या एक 90 प्रतिशत दिव्यांग व्यक्ति को सम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिए जरूरी साधन भी समय पर नहीं मिल पाएंगे, या फिर सरकारी योजनाएं केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएंगी?


